वायु प्रदूषण और अस्थमा
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वायु प्रदूषण और अस्थमा

फ़िटनेस
Arup Basu
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वायु प्रदूषण और अस्थमा

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हाल में हुए शोध से पता चलता है कि भारत नेपाल के बाद दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित देश है। इन निष्कर्षों के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण के कारण लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा से लगभग चार साल पहले ही मृत्‍यु हो जाती है। इसलिए एचआईवी/एड्स, शराब और नशीली दवाओं के दुरुपयोग, असुरक्षित पानी पीने, और संघर्ष और आतंकवाद की तुलना में मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा वायु प्रदूषण है, और इसकी वजह से अधिक जानें जाती हैं।

भारत में वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत औद्योगिक चिमनियों से निकलने वाला कचरा, ऑटोमोबाइल एक्‍झास्‍ट और घरेलू जलावनों के जलने से निकलने वाला कचरा है। इसके अलावा कृषि संबंधी गतिविधियों से निकलने वाला कचरा भी है, जहां किसान खेतों में आग लगाते हैं ताकि खेतों में रोपाई करने के लिए सफाई की जा सके। इस आग से आम तौर पर निकलने वाला एक बाइप्रॉडक्‍ट अमोनिया है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक और जहरीली गैसों में से एक है। फसल जलाने का चलन उत्तर भारत में काफी आम बात है, जो दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण के स्तर को बढ़ाता है।

अस्थमा के बढ़ते मामले


घर के बाहर के आउटडोर वायु प्रदूषण के कारण भारत में अस्थमा यानी दमा के रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ी है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि गंभीर अस्थमा से पीड़ित लोगों की संख्‍या में वृद्धि हुई है। इस तरह के अस्थमा में, लक्षण गंभीर किस्‍म के और नियंत्रित करने में मुश्किल हो सकते हैं। अधिक से अधिक रोगियों को लक्षणों के पूरे दिन तक बने रहने और कभी-कभी अगले दिन भी जारी रहने की शिकायत रहती है। आक्रामक किस्‍म की इस अस्‍थमा से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्‍या में वृद्धि हो रही है, जिसे विशेषज्ञ 'गंभीर' अस्थमा कहते हैं।

अस्थमा के खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न और सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षणों की तीव्रता अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होती है, लेकिन आमतौर पर खाने वाली/इंजेक्शन वाली दवाओं या इनहेलर से इनको नियंत्रित किया जा सकता है। हालांकि गंभीर अस्थमा से पीड़ित लोगों पर इन दवाओं का असर नहीं होता है और उनको बिना कोई राहत मिले ये लक्षण बने हैं। उन्हें अक्सर आपातकालीन चिकित्सा देना और अस्पताल में भर्ती करना जरूरी हो जाता है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता, कार्य उत्पादकता और पारस्परिक संबंध प्रभावित होते हैं। कुछ लोगों में गंभीर अस्थमा जानलेवा भी हो सकता है।

गंभीर अस्थमा का प्रभावी उपचार


ऐसे गंभीर अस्थमा रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिन्हें स्टेरॉयड सहित अन्‍य दवाओं से भी राहत नहीं मिलती है। भारत में यह संख्या 1.6 लाख तक होने का अनुमान है। डॉक्टर जानते हैं कि गंभीर अस्थमा से पीड़ित लोगों के लिए अधिक प्रभावी उपचार खोजना जरूरी है। हो सकता है कि अब इलाज के कुछ नए तरीके मिल गए हों।

वायु प्रदूषण और अस्थमा

कई डॉक्टर ‘एंटी-आईजीई थिरेपी’ नामक नये उपचार का सहारा रहे हैं। सूजन को कम करने वाले स्टेरॉयड की तुलना में, एंटी-आईजीई थिरेपी सूजन को शुरुआत में ही रोक देती है। यह इम्युनोग्लोबुलिन ई को अवरुद्ध करती है। इम्युनोग्लोबुलिन ई एक प्रोटीन है, जो शरीर के किसी एलर्जीन (जैसे वायु प्रदूषकों) के संपर्क में आने पर सूजन पैदा करता है। एंटी-आईजीई थिरेपी के कारण रोग की तीव्रता में 50% की कमी होती है।

गंभीर अस्थमा के लिए एक और आशाजनक उपचार ‘ब्रोन्कियल थर्मोप्लास्टी’ है। यह एक न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रिया है जो फेफड़ों की सूजन वाली मांसपेशियों के सूजन को कम करके संकरे फेफड़ों के वायुमार्ग को फिर से खोलने के लिए ऊष्मा ऊर्जा का उपयोग करती है। वायुमार्ग जैसे ही चौड़ा होता है, सांस लेना आसान हो जाता है, जिससे अस्थमा के दौरों की गंभीरता कम हो जाती है। ब्रोन्‍कियल थर्मोप्‍लास्‍टी एक आउट पेशेंट प्रक्रिया है, जो 3 सप्ताह के अंतराल पर 3 सत्रों में पूरी की जाती है, और अस्थमा के लक्षणों से लंबे समय तक राहत प्रदान करती है।

वायु प्रदूषण और अस्थमा

नए उपचारों के लिए हमारी खोज जितनी महत्वपूर्ण है, मरीजों को 'अपने ट्रिगर को जानने' के लिए प्रोत्साहित करना भी उतना ही आवश्‍यक है। किसी दौरे को ट्रिगर करने यानी उत्‍तेजित करने वाली चीजों से दूर रहकर, अस्थमा और गंभीर अस्थमा दोनों को रोका जा सकता है, या कम से कम उनकी गंभीरता और तीव्रता को कम किया जा सकता है। यह सच है कि अस्थमा के मामले में ट्रिगर अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है, लेकिन सावधानी से निरीक्षण करके, रोगियों को अपने व्यक्तिगत ट्रिगर की पहचान करना चाहिए और समग्र अस्थमा प्रबंधन में सुधार करने के लिए उनसे बचना चाहिए।

डॉ. अरूप कुमार बसु दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में सलाहकार और विभागाध्यक्ष (चेस्ट मेडिसिन) हैं। वह हेल्थहंट में स्वास्थ्य परिषद के सदस्य भी हैं।

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Dr Arup Basu- Head , Department of Interventional Pulmonology, Sir Gangaram Hospital,New Delhi
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